राजा राम अवध रजधानी: उम्मीदों की दीवाली लिखेगी जगमग भविष्य की कहानी
01 नवंबर 2018
क्या है पूरी कहानी पढ़े।
दीप पर्व मनाने के हर प्रांत में अलग-अलग रीति-रिवाज हैं। दीपावली की कई परंपराएं भी बदल गयी हैं लेकिन, अयोध्या में आज भी सदियों पुरानी परंपरा कायम है। भगवान राम और उनके दरबार की पूजा पद्धति आज भी वही है जो वर्षों पहले थी। दीपावली से पहले मंदिरों की साफ-सफाई के साथ भगवान की प्रतिमा को भी विशेेष तौर नहला-धुलाकर तैयार किया जाता है। नए कपड़े सिलवाए जाते हैं और उनके लिए नए आभूषण बनते हैं। खास बात यह है कि अयोध्या के सभी मंदिरों में मिट्टी के दिए जलाए जाते हैं। न केवल घरों में बल्कि मंदिरों के लिए शुद्ध रुई से बनी बाती ही दीपक जलाने में इस्तेमाल की जाती है।
श्रीराम जन्मभूमि विवादित परिसर में विराजमान रामलला के गर्भ गृह में हर वर्ष दीपावली पर विशेष पूजन होता है। इस मौके पर रामलला समेत अयोध्या के सभी छोटे-बड़े मंदिरों में भगवान के गर्भगृह में मिट्टी के ही दीपक जलाए जाते हैं। इसके पीछे मान्यता यह है कि धरती माता की कोख से निकली मिट्टी के बने दिए के प्रकाश से ही धन-धान्य और संपदा बरसती है और अंधकार का नाश होता है। इस पावन अवसर पर भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है, उन्हें नए वस्त्राभूषण पहनाए जाते हैं। भगवान को पहनाए जाने वाले वस्त्र और आभूषण का चुनाव लगभग महीने भर पहले ही हो जाता है। इस मनोरम दृश्य को देखनेे के लिए देश और विदेश सेे भारी तादाद में सैलानी में आते हैं और भक्तों से चढ़ावे के रूप में मिले वस्त्र और आभूषण भगवान को पहनाए जाते हैं।
इस तरह होती है दीपावली की पूजा
सदियों से ही मंदिरों में दीपावली के पर्व पर भगवान का विशेष रूप से श्रृंगार किया जाता है। उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। तरह-तरह के पकवान का भोग लगता है। राम के दरबार में शुद्ध घी के दीपक जलाए जाते हैं। भगवान के सामने फुलझड़ी और आतिशबाजी की जाती है। मंदिरों के मुख्य पुजारी की पूजा अर्चना के बाद अन्य साधु-संत समाज पूजा करता है। इसके बाद आम जन दीपक जलाते हैं लेकिन इनके दीपक गर्भगृह में नहीं जलते।अयोध्या की इस दीपावली को श्रेष्ठतम स्वरूप देने में भी शासन-प्रशासन कोई कोर-कसर नहीं छोडऩा चाहता और इसके लिए तैयारिय़ां चल रही हैं। अयोध्या में दीवावली की पूर्व संध्या पर चतुर्मुखी दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा है।
कंचन कलस बिचित्र संवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥
बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥
वनवास के बाद जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम अयोध्या वापस आए, तो अयोध्यावासियों की तैयारी कुछ इन्हीं पंक्तियों के साथ गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस में दर्शाई थी। राजा राम की राजधानी अयोध्या एक बार फिर आह्लादित है। उत्साहित लोग अपने राम की वापसी की सालगिरह मनाने के लिए अयोध्या को सजाने की तैयारी कर रहे हैं। अवध की प्रजा भी इस दीवाली पर बड़ी ही उम्मीदों से जगमग भविष्य की कहानी लिखे जाने की आस लगाए है।
अयोध्या में प्रवेश करते ही वर्षों की उपेक्षा का दंश साफ नजर आने लगता है। हरि की पैड़ी की तर्ज पर बनी राम की पैड़ी बेपानी है ऐसे में दर्द से कराह रही अयोध्या को अपने राजा राम की अवध वापसी का इंतजार सा है। लोकसभा चुनाव के नजदीक होनेे से अयोध्यावासियों के मन में एक बार फिर उम्मीद की किरण जगी है। उन्हें लगता है कि अब शाायद समस्याओं के समाधान की राह निकलेगी। इधर, पिछले कुछ वर्षों से यहां रामलीला की भव्यता भी फीकी पड़ रही थी, अब उसमें भी बदलाव आएगा। अयोध्या के विकास की तमाम घोषणाएं निश्चित रूप से महाराज राम की इस राजधानी के लिए वैशिष्ट्य का संदेश लेकर आएंगी।
इसी के साथ जनपद वासियों को दीपावली की अनन्त शुभकामनाएं
(कानपुर देहात से मोहित बाथम PRESS INDIA 24)
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